अजय जैन गाजियाबाद।
हमारे समाज में यौन उत्पीडन जब से एक मुद्दा बना है, उसमें आम तौर पर लड़कियों के साथ होने वाली ऐसी घटनाएं चर्चा में आती रही है लेकिन लड़के इस दायरे से बाहर ही समझे जाते रहे है। लड़कियों के साथ होने वाले उत्पीड़न को तो दबाया ही जाता है और समाज में उनकी लड़ाई मुश्किल है ही, किंतु लड़कों के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न को स्वीकार्यता भी नहीं मिली है। पीड़ित को अपने साथ होने वाले दुष्कर्म को लेकर सामाजिक मुश्किलें तो आती ही है, इसके सम्बंध में कानूनी लड़ाई के बारे में भी पीड़ित लड़के का भी अपने सहपाठी के मजाक तथा उपेक्षा के शिकार बनने का खतरा बना रहता है। लड़कियां जिस तरह सावजनिक दायरे से लेकर निजी दायरे तक यौन हिंसा का शिकार होती है वही बात हुबहू लडकों के साथ लागू नहीं की जा सकती। लड़कों का यौन उत्पीड़न निजी दायरे में ही होता है। वैसे इस बारे में पहले भी छिटपुट खबरें आती रहती थीं, लेकिन पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालया के एक कालेज के छात्र अपने कालेज के उपप्राचार्य द्वारा की जा रही ऐसी ही यौन उत्पीड़न की घटना के खिलाफ जब सड़कों पर उतरे, तब अंदाजा लगा कि प्रतिष्ठित कहे जाने वाले शिक्षा संस्थानों में भी यह मसला कितना व्यापक है। जिन छात्रों ने शिकायत करने का साहस जुटाया उनसे कई गुना ऐसे छात्र हैं, जो अत्याचार का शिकार होने पर बोलने की हिम्मत नहीं जुटा सके। ऐसे पीड़ित जब भी काउंसलिंग के लिए आते हैं तो वे लड़कियों की ही तरह आतंकित होते हैं कि किसी और को पता न चले। दरअसल लड़के जब यौन उत्पीड़न का शिकार होते हैं तो उन पर भी सामाजिक दबाव होता है। जहां लड़कियों या महिलाओं पर शुचिता भंग होने, इज्जत मिट्टी में मिल जाने आदि का दबाव होता है तो लड़कों पर उनकी अपनी मर्दानगी का शक का खतरा रहता है। उन्हें महिलाओं जैसा कमजोर न समझा जाए या लड़कियों के निगाह में गिरने का दबाव होता है। पितृसत्ता की विचारधारा दोनों पक्षों पर हावी रहती है। लड़के भी इसी बात से अधिक परेशान रहते हैं कि कहीं ऐसी घटना से उनकी मर्दानगी शक शोषण का शिकार के घेरे में न आ जाए। स्कूलों में लड़के छोटे ही होते हैं इसलिए वे आसानी से अपने शिक्षक व सीनियर या सहपाठियों के आतंक के सामने दब जाते हैं। लेकिन कालेजों के विद्यार्थियों का भी अपने शिक्षक के खिलाफ आवाज उठाना आसान नहीं होता। दिल्ली जैसे विश्वविद्यालय में आंतरिक मूल्यांकन के नम्बर भी परीक्षा के अंतिम मूल्यांकन के नंबर भी परीक्षा के अंतिम नतीजे में जुड़ते हैं, जिसे देने का काम पूरी तरह उपरोक्त विषय के अध्यापक के हाथ में होता है। छात्र को चुप कराने के दबाव देने के कई प्रकार के हथियार रहते हैं। आमतौर पर उत्पीड़क की तुलना में पीड़ित किसी ने किसी प्रकार की कमजोर स्थिति में होते हैं फिर चाहे इसका संबंध आर्थिक पहलू से हो या सत्ता संबंध से कुछ साल पहले अपने परिचित के हाथों यौन अत्याचार का शिकार एक युवक काउंसलिंग के लिए आया तो उसने बताया कि पिताजी ने जिस परिचित के यहां उसे टिकाया, वहीं उत्पीड़न करते थे। दिक्कत यह थी कि उसके निर्धन पिताजी उपरोक्त व्यक्ति के एहसानों से दबे थे। ऐसी पृष्ठभूमि में जो भी लड़के या छात्र यौन हिंसा के विरूद्ध आवाज उठाते हैं तो उनके प्रति समाज को अधिक संवेदनशील बनना चाहिए तथा कोशिश भी की जानी चाहिए कि अपराध की पड़ताल सही तरीके से हो। निश्चित ही समस्या को दबाने या छिपाने से उसका सही समाधान नहीं निकलता, इसलिए ऐसे अपराधों का मुखर प्रतिरोध हो सके ऐसे इंतजाम करने चाहिए। कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय ने जिन दिशा निर्देशों को जारी किया उसकी तहत देश के पैमाने पर विभिन्न संस्थानों ने यौन उत्पीड़न को रोकथाम के लिए अपनी नीतियां भी बनाई हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा वर्ष 2004 में बनाई गई नीति पर निगाह डालें तो वह स्पष्ट तौर पर जेण्डर न्यूट्रल है।